Friday, 19 October, 2012

सपनों की रेलगाड़ी









नींद के स्टेशन से,
पलकों के प्लेटफार्म से,
रोज रात को छूटती है
मेरे सपनों की रेलगाड़ी,,,
 
एक नितांत गोपनीय यात्रा के लिए,
जिसमें होता नहीं
कोई मेरा सहयात्री,,
 
जो ले जाती है मुझे
और
उतारती है कभी किसी जगह अनजानी,,
घुमाती है अजीब से,अनदेखे से,
गलियाँ और कूचे,,,,,
 
तो
कभी उतार देती है मुझे
मेरी ख्वाहिशों के शहर,
जो
दिन में भी अक्सर देखा है मैंने
सोचती मुद्रा में,
पलकों को मीचे मीचे,,,
 
और
कभी किसी पुरानी पहचान के घर,
जो आखिरी बार कब देखा था उजाले में,?
याद नहीं पड़ता,,,
 
तो
कभी किसी गुज़रे हुए लम्हे के दरवाज़े,
जहाँ मेरे और मेरे मीत के साथ चलते चलते
वक़्त का सूरज
कभी नहीं थकता,,
कभी नहीं ढलता,,,
 
और
कभी किसी
पुराने दर्द के समंदर के किनारे,
जिसको देख के
फिर उठती है वही गहरी एक टीस,,,
 
तो
कभी उस ख़ुशी के गाँव,
मेरे घर तक पहुँचने में
दिन है जिसके बस,
उन्नीस या बीस,,,
 
और
कभी ऐसे ही लगाती है
एक चक्कर ये रेल,
उन  शहरों का,
उन चेहरों का,
जो मेरी अब तक की ज़िन्दगी ने बसाये है,,,,
 
तभी
माँ की ”उठो,सुबह हो गयी” की आवाज़ आती है,,
और मेरे सपनों की रेलगाड़ी
वापिस मेरी पलकों के स्टेशन पर
पहुंची पाती है,,,,
 
आँखे मलते हुए,
घडी को देखते, उठते हुए फिर हड़बड़ी में,
तैयार होकर झटपट,
कभी
सपने में देखी शक्लों और जगहों को साथ लेकर,
मैं काम पे निकल जाती हूँ,,,
 
और
कभी पूछो,
तो भी आँखों को याद  नहीं आता,
कि
कल रात
सफ़र पर कहाँ तक गए थे,
रेलगाड़ी छूटी भी थी या नहीं !!!!!!!!!!

Saturday, 29 September, 2012

लोग और कहानियाँ

 लोग भी तो,
 जैसे
 एक कहानी ही होते हैं
 और
 कहानियाँ,
 जैसे कि  लोग,,!!
 
 अनेक प्रकार के लोग मिलते हैं संसार में,
 जैसे
 कई किस्म  की  कहानियाँ फिरती हैं बाज़ार में,
 
 कहानियाँ जैसे,
 कुछ बिलकुल उबाऊ,
 कुछ बेहद दिलचस्प,
 कुछ संवेदनशील,
 कुछ प्रेरणादायक,
 कुछ रूमानियत से भरी,
 कुछ जैसे रहस्यमयी,
 कुछ बचपना सा रखती,
 कुछ जिम्मेदारियों सी खिलती,
 कुछ नैतिक मूल्यों से भरपूर,
 और कुछ सिखाती बेईमानी के गुर,
 कुछ मासूम सी जैसे सुबह  की   हल्की धूप,
 और कुछ जो कहे बहुत कुछ,रहकर मद्धम सा चुप,
 कुछ जो दिल को छू जाये,
 कुछ जिन्हें हम कबका बिसरा आये,,
 
क्या लोग भी ऐसे ही नहीं होते हैं बिल्कुल,,??!!
 
लोग जैसे,
कुछ जो रहते हैं उम्र भर तक दिलो-दिमाग में,
कुछ जो साथ देते हैं हर धूप-छाँव में,
कुछ जो स्मृतियों में इस तरह धूमिल हो जाते हैं,
कि चेहरा देख कर भी याद ना आने पाते हैं,,
कुछ जिनको रखना चाहते हैं हम अपने साथ ताउम्र,
और कुछ जिनसे मिल के लगे mood हो गया चकनाचूर,
कुछ जिनके साथ वक़्त बिताने में मजा आये,
और कुछ जिनके होने को सिर्फ महसूस किया जाए,
कुछ जिन्हें सुन कर लगता है,हमारे मन की कह गए,
और कुछ को देखकर लगता है,काहे को इतना शोर मचाये,,
 
क्या कहानियाँ भी ऐसी ही नहीं होती हैं बिल्कुल,,??!!
 
हर इंसान की होती है,
शब्दों में घुली एक कहानी,
जो होती है सार उसके पूरे जीवन का,
और
कहानियों को पढ़ कर भी तो लगता है ना,
कि पात्र साक्षात् जीवंत हो कर चल रहे है
बिल्कुल इंसानों के भेस में,,!!
 
तो ये कहना
कि लोग होते हैं जैसे कि कहानियाँ,
और
कहानियाँ होती हैं जैसे कि लोग,
 ”गलत तो नहीं”??!!!

तो ही अच्छा है

कुछ बातों को समझने में देर ना हो तो ही अच्छा है,
 कम ही होती हैं वो बातें  जिनकी समझाइश वक़्त की मोहताज नहीं होती..!
 
 कुछ उम्मीदें किसी से इंसान को ना हो तो ही अच्छा है,
 कम ही होती हैं वो उम्मीदें जिनकी पोशाकें आखिर तक उम्रदराज नहीं होती..!
 
 कुछ पहचानें इंसान के आज में शामिल ना हो तो ही अच्छा है,
 कम ही होती हैं वो पहचानें जिनकी पेशी अँधेरे का आगाज़ नहीं होती..!
 
 कुछ मौकों की रात लापरवाह नींदों में जाया ना हो तो ही अच्छा है,
 कम ही होती हैं वो नींदें जिनके खुलने तक रात नाराज़ नहीं होती..!
 
 कुछ गुजारिशें ज़िन्दगी से ना की जाए तो ही अच्छा है,
 कम ही होती हैं वो गुजारिशें जिनके मरने  से रूह लाइलाज नहीं होती..!!

Monday, 27 August, 2012

सपनों से भरपूर एक नया जहाँ होगा,

सपनों से भरपूर एक नया जहाँ होगा,
जहाँ रोशन तेरे मन का हर दीया होगा,
ना रहेगी कमी किसी भी ख़ुशी की,
नसीब कभी तो तुझ पर मेहरबां होगा…
 
हाँ,माना कि मुश्किल है अभी तेरी डगर,
पर कर मेरे दोस्त,थोडा सा सब्र,
क्या हुआ जो ढक लिया है अभी अँधेरे ने तेरा नूर,
छंटेगा एक दिन ये और मिलेगी सुबह की चाबी जरूर…
 
बस कभी खुद का खुद पर से भरोसा टूटने मत देना,
और हर हाल में तेरे साथ दोस्त, ”मैं हूँ ना”….!!!!
 

तो बता साँसों के साथ मद्धम मद्धम तू रूह में कैसे ना उतरे…!!!

तेरी खुशबू फैली हुई है कमरे के हर कदम ,हर कोने में,
तो बता साँसों के साथ मद्धम मद्धम तू रूह में कैसे ना उतरे…!!!

बिस्तर पे मौजूद है तेरी निशानियों की सिलवटें अब तक,
तो बता तेरी याद फिर जिस्म को हल्के हल्के क्यों ना कुतरे…!!!

तेरी हंसी को ही तो घूँट भर के पिया था मैंने पानी के बदले ,
तो बता मेरी हंसी से तेरा चेहरा फिर फिजाओं में कैसे ना उभरे….!!!

शीशे में दिखता है तेरा अक्स मेरी परछाई से झांकता सा हर बार ,
तो बता आइना देखने को बारम्बार मासूम दिल क्यूँ ना मचले…..!!!

मोहब्बत की हवाएं जब टकरा रही हैं मुझसे अलग ही अंदाज़ में,
तो बता दिल मोहित होकर बल्लियों क्यों और कैसे ना उछले….!!!!!!!!

Friday, 17 August, 2012

अक्सर पुकारता है

अक्सर पुकारता है,
 जब वो पेड़ जिसकी छाँव ने देखा है,
 मेरी गोद में तुम्हे,
 मंद मंद मुस्कराहट आ जाती है ढेर सारे आंसूओं के साथ,,
 
 अक्सर पुकारता है,
 जब वो बरामदा जिसके क़दमों ने देखा है,
 मेरी ओट में तुम्हे,
 उठा ले जाते हैं सालों पीछे मुझे तेरी यादों के हाथ,,
 
 अक्सर पुकारता है,
 जब वो ख़त जिसकी बेचैनी ने देखा है,
 मेरी लिखावट में तुम्हे,
 तकिये को नमकीन करने में गुज़र जाती है मेरी पलकों की रात,,
 
 अक्सर पुकारता है,
 जब वो कोना जिसके सुकून ने देखा है,
 मेरे वजूद की जन्चावट में तुम्हे,
 नाचने से लगते है मेरे दिल के अनकहे गर्व भरे जज़्बात,,
 
 अक्सर पुकारता है,
 जब वो चौराहा जिसके नुक्कड़ ने देखा है,
 मेरे इंतज़ार में तुम्हे,
 जीवित हो उठती है अधूरी रह गयी अपनी हर मुलाकात,,
 
 अक्सर पुकारता है,
 जब वो समय जिसकी सुईयों ने देखा है,
 मेरे आत्मीय प्यार में तुम्हे,
 सिसकियाँ चुनने लगते है दिल के टुकड़े जिस्म से बाहर आने के बाद,,
 
 अक्सर पुकारता है,
 जब वो चाँद जिसकी सफेदी ने देखा है,
 मेरे करवा चौथ में तुम्हे,
 अंगड़ाई लेने लगते है चाशनी में लिपटे फ़िक्र के संवाद,,
 
 अक्सर पुकारता है,
 जब वो फैसला जिसकी रंगत ने देखा है,
 मेरे भरोसे की ओस में तुम्हे,
 सुगन्धित कर देता है सारे घर को मेरे इश्क की मटकी में अमृत सा भरा नाज,,
 
 अक्सर पुकारता है,
 मुझे हर वो बेजान साया,
 जिसने मेरे और तुम्हारे रिश्ते को सांस लेते देखा है,,
 
 ”क्या तुम्हे भी अक्सर ऐसी पुकारें सुनाई देती हैं”!!!

आइना(couplet)

हँसी यूँ  दिल में और ख़ुशी यूँ  चेहरे पे कभी न थी ,,,,
आइना  भी पूछ रहा है ये कौन सी तमन्नाओं  का आसमान है....!!!!!

बस यूँ ही चलते जा रहे है हम,,

ना कोई ख़ुशी,ना कोई गम,
बस यूँ  ही चलते जा रहे है हम,,
 
जाना कहाँ है,खुद को कुछ पता नहीं,
या यूँ कहिये कि जानना चाहते ही नहीं हम,,
 
खो दिया है अपना सब कुछ ज़िन्दगी के सफ़र में,
और अब ये सफ़र आगे करना ही नहीं चाहते हम,,
 
वक़्त अब भी चल रहा है,पर थम गया है सब कुछ मेरे अन्दर,
और सच पूछो तो ऐसे ही अब रहना चाहते हैं हम,,
 
अब कुछ नहीं है मेरे पास सिवा कुछ बीते प्यारे लम्हों की यादों के,
और कभी कभी उन्ही यादों में जाके जी आते हैं हम,
 
वो यादें ज़िन्दगी से बढ़कर और ज़िन्दगी उनसे ख़ूबसूरत है अब भी,
और इसीलिए  उनके सहारे ही  खुद को अकेला नहीं पाते हम…!!!!
                                                                                                   (२ जनवरी,०७ )

Wednesday, 15 August, 2012

4 liner

             आज के ज़माने में किसी को प्यार की कद्र कहाँ है,
             हर किसी  का अपना ही एक मस्त जहाँ है,
             अपनी ही दुनिया में इस कदर खोया है हर इंसान,
             कि दिलों में प्यार के पनपने की जगह  ही कहाँ है…!!!

नज़्म

आज एक नज़्म गुजरी आँखों के रास्ते से,
ओझल होते होते नमी छोड़ गयी,
 
ख्याल कौंधा,,
”अच्छा हुआ जो ये नज़्म पढ़ी,
बहुत दिन हुए,
आँखों ने ओस नहीं छुई थी”…!!!

Monday, 13 August, 2012

कहते हैं तक़दीर होती है इंसान के अपने ही हाथों में,

 अपने और दुनिया के मुहाने पर खड़े हैं कुछ इस तरह,
 कि कभी इस रस्ते तो कभी उस रस्ते को ताकते हैं..!!
 
नियति देती नहीं चुनाव की भी सहूलियत इंसा को अक्सर,
 जानते हुए भी दिलो दिमाग कहाँ इस व्यूह को मानते हैं..!!
 
कहते हैं तक़दीर होती है इंसान के अपने ही हाथों में,
 पर क्या उसके रास्ते सदा हमारी इच्छा से भागते हैं..!!
 
नियति और तक़दीर के खेल में खोता इंसान ही है बेवजह,
 मगर ज्यादा  चिल्लाने से थोड़े ही मंदिर के खुदा जागते हैं..!!
 
गुस्सा क्यूँ न भरे इंसान के भीतर हालात से,बताओ जरा,
 गर  मंजिल से कोसों दूर क़दमों तले अनजान रास्ते हैं..!!!

ख्वाहिशें पतंगों जैसी

कुछ ख्वाहिशें हैं,
 अरमानों जैसी,
 सांस ले रही हैं,
 बंद मुट्ठी में,
 उड़ना चाहती हैं खुली हवा में,
 जैसे पिंजरे से निकले हो पंछी,
 पर सिसकती हैं,
 क्यूंकि
 ख्वाहिशें पंछियों के पंख जैसी नहीं होती,
वो तो कटती हैं पतंगों की भांति,
अपनों से ही तो,
कभी हालात तो कभी जिम्मेदारी के मांजे से,
ख्वाहिशों के पंख हैं,
पर हाथ बंधे हैं…..
ऐसे में उन्हें सहेजने वाली मुट्ठी ही,
उनका गला न घोंट दे तो क्या करे…!!!!!!

Wednesday, 8 August, 2012

मेरी रूह में तेरी शख्सियत कुछ इस तरह समाई हो…

बतलायें मेरी धडकनें मुझसे पहले तेरे दिल को अपनी बातें,
 मेरी रूह में तेरी शख्सियत कुछ इस तरह समाई हो…
 
 पढ़ जाओ मेरे बिन उभरे लफ़्ज़ों की किताब भी तुम एक झटके में,
 तेरे मेरे रिश्ते में समझ की इतनी गहराई हो…
 
 गर मान लो कभी वक़्त लग भी जाए तुम्हे मेरे कोई ख़यालात समझने में,
 तो भी मेरे सब्र और इत्मीनान की दीवार कभी ना चरमरायी हो…
 
 ना कभी पतझड़ आये मेरे एहसासों की शाखों पर,
 दिल की बगिया में सैर करती तेरी मोहब्बत की ऐसी पुरवाई हो…
 
 भरोसे के चप्पू ने इस तरह थाम के रखा हो रिश्ते को,
 कि समर्पण की नैया तूफानों में भी कभी नहीं डगमगाई हो…
 
 जो भी दे हम एक दूजे को,सिर्फ और सिर्फ अपनी ख़ुशी से दे,
 देकर कुछ पाने की उम्मीद कभी ना रिश्ते से लगायी हो…
 
 आने वाले दौर में जब मोहब्बत खो चुकी होगी अपनी ताजमहल सी परिभाषाएं,
 तब हमारी कहानी चोपालों पर बैठ बुढ़ापे ने जवानियों को सुनाई हो…

तलाश

व्याकुल  ”मैं” ने 
एक आंसू की तलाश में  
सारा  अंतर्मन छान मारा,,
 
छलनी अंतर्मन
पर व्यर्थ…..
आंसू होता तो मिलता ना…..!!
 
आखिर
सारे साल सूरज का मुंह देखने के बाद तो,,
धरती में भी ”दरारें” ही बचती है,,,
पानी नहीं..!!!!

कतरा(couplet)

अबके जो बूँदें गिरी तो  जिस्म खाली खाली बोझिल सा  हो गया है कुछ,
शायद आज  आँखों से रूह का आखिरी कतरा भी बह गया…………!!!!!!!

Monday, 5 March, 2012

3 liners(an experiment)

टूटे सपने,
रिसती उम्मीदें,
भारी ज़िन्दगी..!

आकुल आरजुएं,
छटपटाते प्रयास,
थकी ज़िन्दगी..!

फैला आसमां,
सिकुड़े पंख,
रुकी ज़िन्दगी..!

बेमानी रिश्ते,
तर्कहीन समझौते,
फँसी ज़िन्दगी..!

बंधन खुले,
मंजिल चले,
हँसी ज़िन्दगी..!!!!
 

नाम

जो चली गयी,,
उसी का नाम तो ज़िन्दगी था,

जो बाकी है,,
उसका नाम तो चंद साँसों के सिवा
कुछ भी नहीं…!!

Friday, 2 March, 2012

तो गलत होगा न,, इसके लिए किसी और से शिकायत गर करें..!!

आ गयी ज़िन्दगी की असलियत एक पल में नज़र के सामने,
जब टूटे सपनों  की कलम से भरने ज़िन्दगी के पन्ने  हम  चले…!!

रुकने की फुर्सत जब एक पल के लिए भी  देती नहीं ज़िन्दगी,
तो भागती राहों पर पैर टिकाते कभी पैर दौड़ाते कैसे बन पड़े..!!

अपने ही समय से अपने लिए ही वक़्त चुराना लगता है नासाज,
पुकारें आने लगती है गर एक पल भी  खुद से बतियाने हम लगे..!!

ज़िन्दगी की ऐसी  शक्लो- सूरत  भी तो पर हम ही लोग चुनते हैं,
तो गलत होगा न,, इसके लिए किसी और से शिकायत गर करें..!!

सीलन

बातें पी पी के,
सीलन आ गयी दिल की दीवारों पे,
सोच रही हूँ,
‘मुरम्मत करवा लूँ’..!!

सुनो,
सीलन खुरचुं अगर
तो टुकड़े  पकड़ने  आओगे ना..!!!

जुड़ाव

क्या कमाल बात है,
उन गलियों से भी मुझे बेहिसाब  जुड़ाव महसूस होता है,

गुजारा  है जिनमे बचपन अपना
मेरे महबूब ने
या
गुजरा  करते थे जिनसे  जनाब
कभी  बस यूँ ही….!!!

4 liner

 हम तो कबके पिघल जाते उनकी बांहों में,,मगर
 उन्होंने कभी कहा ही नहीं कि वो हमारे बिन अकेले हैं…
 अजब गज़ब सी ही है इस इश्क की तासीर जनाब,
 यहाँ तो साहिलों पे भी उठते ज्वार-भाटों के  रेले हैं…!!!!

Wednesday, 11 January, 2012

ख्वाब भी मर कर तारा बनते हैं..!!

अक्सर देखा होगा तुमने भी,,
सभी देखते हैं..

एकटक आसमां की ओर,
तारों के दरमियाँ,
जब कोई अपना चला जाता है,
हमेशा हमेशा के लिए,
इस दुनिया से दूर,,

लेकर  बैठ जाते हैं न हम,
अपनी यादों से भरे कटोरे को,
उड़ेलते है धीरे धीरे
एक अर्घ्य के जैसे
उसे अपने आंसूओं में…
ताकते हुए आसमां की ओर
क्योंकि
दूसरी दुनिया तो आसमां में बसती है ना..!!

पर क्या कभी गौर किया है..?

वो लोग क्या ढूंढ़ते होगे
अनंत आकाश में,
जिन्होंने साक्षात्कार नहीं किया अभी तक
जीवन की इस अंतिम सच्चाई का,
किसी अपने के लिए,

क्या ढूंढते होंगे वो….!!!!!

शायद अपने ख्वाब………

टूटे ख्वाब,
अधूरी अभिलाषाएं,
बिलखते अरमान,,

हाँ,,यही  तलाशते होंगे,,


क्योंकि शायद,
सिर्फ लोग ही नहीं,,
ख्वाब भी मर कर तारा बनते हैं..!!

आखिर  ख्वाबों का मरना भी तो जीवन की अमिट सच्चाइयों में से एक है…!!

इंतज़ार

मालूम नहीं हैं मुझे,
या यूँ कहूँ,,
मालूम है भी,
पर शायद पूरा विश्वास नहीं है…!!

कि तुम समझ पाते हो या नहीं,
मेरे शब्दों के बीच में,
ख़ामोशी से जगह बना कर बैठे,
उन सवालों,
उन संवेदनाओं को,
जो मैं चेहरे पर नहीं लाती…….

कि तुम समझ पाते हो या नहीं,
मेरे दिमाग में चल रही
उन अस्थिरताओं को,
जो मेरे कानों  तक पहुँचने  ही नहीं देती
तुम्हारी बातों में छिपे मर्म को कभी कभी……..

कि तुम समझ पाते हो या नहीं,
उस ख़ामोशी को,
पी जाती हूँ जिसे मैं अक्सर,
जो जन्म ले लेती है मुझमे,
तुम्हारे तर्कों या हालातों के प्रत्युत्तर में………

कि तुम समझ पाते हो या नहीं,
उन बातों को,
उन विचारों को,
जो मैं कह नहीं पाती अक्सर,
कभी किसी वजह से तो
कभी किसी वजह से………

हर बार
दो चार होती हूँ मैं
इसी तरह की भावनाओं,जज्बातों और
कुछ हद तक आशंकाओं से,

जब उपज जाती हैं
ऐसी सोच भरी चुप्पी में डाल देने वाली क्यारियां,
किसी भी
तर्कसंगत या निर्मूल विचार की बारिश से,
जो जाने अनजाने
गिर जाती है मेरे मन के आँगन में…..

और हर बार
तुम गलत साबित करते हो
इन सभी आशंकाओं को,
मुझे ही यह बता के,
कि क्या सोच रही थी मैं,,,
क्या नहीं कहा मैंने
कब किस पल..!!!


इस बार भी ऐसी ही कशमकश में घिरी बैठी हूँ..!!

और
बस इंतज़ार है
अब उस वक़्त का,
जब
एक बार फिर से 
मेरी खामोशियाँ,,मेरी संवेदनाएं,
तुम्हारे दिल से निकले शब्द रूपों में बहे….!!!

Friday, 6 January, 2012

फ़साना

 वो फ़साना
 जो हकीकत ना बन सका,,

 वो हकीकत
 जो सिर्फ एक फ़साना बन कर रह गयी,,

 वो कुछ और नहीं,,मेरी मोहब्बत की दास्ताँ है..

 हाँ, वही दास्ताँ,
 जिसके हर लिखे और हर कोरे पन्ने पर आज भी
 तुम्हारा चेहरा
 सूरज की भांति चमकता है
 और चाँद की तरह मेरे उदास मन को ठंडक पहुंचाता है…

 मन,
 जो उदास हो कर के भी उदास नहीं है,
 क्योंकि,
 तुम्हारी मोहब्बत के शीशे में खुद को
 इठलाता,,खिलखिलाता,,गुनगुनाता जो देखता है अक्सर..

 पर जैसे ही हकीकत का पानी
 इस शीशे को छू के गुज़र जाता है,
 और धुंधले कर जाता है हंसती खेलती कल्पनाओ के चेहरे,,
 मन भी शीशे के जैसे चूर चूर हो कर
 उदास हो जाता है उसी क्षण,,

 और फिर
 फ़साने की यादें मन की वादियों में उतरकर
 चारों तरफ फैला लेती हैं अपना साम्राज्य,,
 और मेरा मन इस साम्राज्य की धरती होते हुए भी,
 बन जाता है सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा इस पूरी विशालता का,,

और तुम
धीरे धीरे अपने पाँव बढ़ाते जाते हो इस धरती पर
जैसे कभी धूप,कभी अँधेरा बढ़ता जाता है आगे
सब कुछ अपनी आगोश में लेते हुए,,

पर मैं इस आगोश में होकर के भी नहीं हूँ,
और तुम मेरे पास होकर के भी नहीं हो,,

 और इसीलिए है ये दास्ताँ एक ऐसा फ़साना,
जो हकीकत ना बन सका…………….जिस्म के शब्दों में,,

और साथ ही रोम रोम में बसी एक ऐसी हकीकत,
जो एक फ़साना बन कर रह गयी…………………रूह के शब्दों में….!!!

रंग

एक नज़्म पड़ी है कागज़ पे,
कुछ कोरी सी,
कुछ काली सी..!

तुम जो आके  रंग भर दो,
धड़कन इन्द्रधनुषी हो जाए,

दिल में ही नहीं,
नज़्म में भी..!!!